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Showing posts from June, 2017

MS Dhoni Retirement: धोनी ने लिया संन्यास, सोशल मीडिया पर किया पोस्ट

MS Dhoni Retirement: धोनी ने लिया संन्यास, सोशल मीडिया पर किया पोस्ट : div class='at-above-post addthis_tool' data-url='https://www.dehuti.com/ms-dhoni-retirement/'/divदो बार के विश्व कप विजेता भारत के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी (MS Dhoni) ने शनिवार को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट (International cricket) को अलविदा (Retirement) कहकर पिछले एक साल से उनके भविष्य को लेकर लग रही अटकलों पर विराम लगा दिया। गैर पारंपरिक शैली में कप्तानी और मैच को अंजाम ...

कमरे में करें मशरूम की खेती

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पिछले कुछ वर्षों में मशरूम ने एक खास जगह बना ली है। लेकिन जिस अनुपात में मशरूम की मांग है, उस अनुपात में देश में इसका उत्पादन नहीं हो पा रहा है। ऐसे में मशरूम उत्पादन कर आप अपने स्वरोजगार को बढ़ाने के साथ-साथ बेहतर कमाई भी कर सकते हैं। सामान्य तौर पर मशरूम उत्पादन के लिए 20 से 40 डिग्री तापमान होना आवश्यक है। इसके अलावा वातावरण में नमी का होना भी जरूरी है। नमी के बगैर मशरूम का ठीक तरह से विकास नहीं हो पाता है। लखनऊ जिला उद्यान अधिकारी डीके वर्मा बताते हैं, “पिछले कुछ साल में मशरूम की मांग बढ़ी है, उद्यान विभाग किसानों को मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण भी देता है। प्रशिक्षण लेने के लिए किसान को पहले विभाग में आकर पंजीकरण कराना होता है।” दो-तीन महीने में फसल तैयार मशरूम का सफल उत्पादन दो से तीन महीने में आसानी से हो जाता है। मशरूम की बुआई से लेकर कटाई तक में लगभग दो-तीन महीने का समय लग जाता है। बाजार देश में आम लोगों तक पहुंच बढ़ाने से मशरूम की डिमांड काफी बढ़ गई है। इसे देखते हुए मशरूम के काफी अधिक उत्पादन की जरूरत है। हालांकि मशरूम का उत्पादन काफी तेजी...

फ्री में बांटतें है खरबूजे, बीज से कमाते हैं हज़ारों

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“जिसको भी खरबूजे खाने हों, हमारे गाँव आ जाए, मीठे खरबूजे खिलाएंगे और एक भी पैसे नहीं लेंगे, जो खरबूजा मीठा न निकले उसे न खाएं। उसे हमारा जानवर खा लेगा” ये कहना है रामदीन गौतम का।  कानपुर नगर के शिवराजपुर ब्लॉक से 14 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में दलीपपुर, कंजती, देवकली, सखरेज गाँव हैं, जहां लगभग 50 बीघे में खरबूजे की खेती की जाती। यहां खरबूजे बाजार में बेचे नहीं जाते, बल्कि इन खरबूजों को आसपास के लोगों को खिलाकर उनसे बीज एकत्र किया जाता है। अगर खरबूजे की ठीक-ठाक पैदावार हो गयी तो एक बीघे खेत से एक कुन्तल बीज मिल जाता है। बीज 14000 से 15000 हजार रुपए प्रति कुन्तल बाजार में बीज का भाव है। दलीपपुर के किसान महेश कुमार (50 वर्ष) बताते हैं, “हम पिछले दसियों वर्षों से खरबूजे की खेती कर रहे हैं, पर आज तक हमारे गाँव का खरबूजा कभी मंडी नहीं गया, क्योंकि हमने कभी सोचा ही नहीं जो परम्परा हमारी वर्षों से चली आ रही उसे हम समाप्त करें। इसलिए हम सिर्फ बीज का उत्पादन करते हैं।” चन्द्रकिशोर (45 वर्ष) कहते हैं, “जो आलू और सरसों का खेत खाली होता है उसमें फरवरी महीना में खरबूजे की बोवाई कर ...

भारत में मवेशियों की नस्ल व उनकी विशेषताएं

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दुधारू नस्ल सहिवाल मुख्यतः पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार व मध्य प्रदेश में पाया जाता है। दुग्ध उत्पादन- ग्रामीण स्थितियों में 1350 किलोग्राम व्यावसायिक फार्म की स्थिति में- 2100 किलो ग्राम प्रथम प्रजनन की उम्र – 32-36 महीने प्रजनन की अवधि में अंतराल – 15 महीने गीर दक्षिण काठियावाड क़े गीर जंगलों में पाये जाते हैं।  दुग्ध उत्पादन- ग्रामीण स्थितियों में- 900 किलोग्राम व्यावसायिक फार्म की स्थिति में- 1600 किलोग्राम थारपकर मुख्यतः जोधपुर, कच्छ व जैसलमेर में पाये जाते हैं दुग्ध उत्पादन- ग्रामीण स्थितियों में- 1660 किलोग्राम   व्यावसायिक फार्म की स्थिति में- 2500 किलोग्राम करन फ्राइ करण फ्राइ का विकास राजस्थान में पाई जाने वाली थारपारकर नस्ल की गाय को होल्स्टीन फ्रीज़ियन नस्ल के सांड के वीर्याधान द्वारा किया गया। यद्यपि थारपारकर गाय की दुग्ध उत्पादकता औसत होती है, लेकिन गर्म और आर्द्र जलवायु को सहन करने की अपनी क्षमता के कारण वे भारतीय पशुपालकों के लिए महत्वपूर्ण होती हैं। नस्ल की विशेषताएं इस नस्ल की गायों के शरीर, ललाट और पूंछ पर का...

बुआई हेतु बीज खरीदने से पूर्व जाने बीजों के विषय में महत्वपूर्ण बातें

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किसानों को कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए हमेशा उत्तम गुणों वाले बीज ही उपयोग करना चाहिए I भारत में भारत सरकार की राष्ट्रीय बीज निगम लिमिटेड, राज्य बीज एवं फार्म विकास निगम  द्वारा एवं अन्य कंपनियों एवं किसानों के द्वारा उत्तम कोटि के बीजों का उत्पादन किया जाता है I सभी किसान भाई बीज खरीदते समय निम्न बातों का ध्यान रखें I उत्तम बीज को निम्न तीन समूहों में रखा गया है- प्रजनक बीज आधार बीज और प्रमाणित बीज। प्रजनक बीज  वह वर्ग है जो आनुवांशिक रूप से शुद्ध रहता है तथा इसको प्रजनक (ब्रीडर) की देखरेख में तैयार किया जाता है ताकि उसकी गुणवत्ता ठीक रहे। इन बीजों की थैलियों पर पीले रंग का टैग (लेबिल) लगा होता है। आधार बीज  को बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा प्रजनक बीज से तैयार किया जाता है। इस बीज की थैलियों पर सफेद रंग का टैग लगा रहता है। प्रमाणित बीज  को भी बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा आधार बीज से पैदा कराया जाता है। यह कार्य प्रत्येक बीज एवं फार्म विकास निगम या उन्नतशील किसानों द्वारा बीज पैदा करने की मानक विधियों के अनुसार किया जाता है। प्रमाणित बीज के थैलों पर नीले र...

किसान क्रेडिट कार्ड के लाभ, प्राप्त करने के लिए प्रकिया एवं विशेषताएं

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किसान क्रेडिट कार्ड योजना के लाभ – सरल वितरण प्रक्रिया नकद आपूर्ति के लिए बहुत ही आसान प्रक्रिया प्रत्येक फसल के लिए ऋण हेतु आवेदन की आवश्यकता नहीं किसानों के लिए किसी भी समय ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करना व किसानों के लिए ब्याज़ के बोझ को घटाना किसानों की सुविधा और विकल्प के अनुसार खाद और उर्वरक की खरीद करना। डीलर से नकद खरीद पर छूट 3 वर्षों तक ऋण सुविधा- हर मौसम में मूल्यांकन की आवश्यकता नहीं कृषि आय के आधार पर अधिकतम ऋण सीमा को बढ़ाना ऋण सीमा के भीतर कई बार राशि का निकालना संभव फसल कटाई के बाद अदायगी का प्रावधान कृषि अग्रिम के अनुसार ब्याज़ दर लागू कृषि अग्रिम के अनुसार प्रतिभूति, मार्जिन एवं प्रलेखन नियम होंगे किसान क्रेडिट कार्ड प्राप्त करने की प्रक्रिया अपने नज़दीकी सार्वज़निक क्षेत्र के बैंक से सम्पर्क कर ज़ानकारी हासिल करें। योग्य किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड दिया जाएगा और उन्हें पासबुक दिया जाएगा। पासबुक पर किसान का नाम व पता, भूमि ज़ोत का विवरण, उधार सीमा, वैधता अवधि, एक पासपोर्ट आकार का फोटो होगा जो पहचान पत्र का काम करेगा और लेन-देन का लेखा-ज़ोखा...

टपक सिंचाई (ड्रिप सिंचाई) प्रणाली क्या है?

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टपक सिंचाई वह विधि है जिसमें जल को मंद गति से बूँद-बूँद के रूप में फसलों के जड़ क्षेत्र में एक छोटी व्यास की प्लास्टिक पाइप से प्रदान किया जाता है। इस सिंचाई विधि का आविष्कार सर्वप्रथम इसराइल में हुआ था जिसका प्रयोग आज दुनिया के अनेक देशों में हो रहा है। इस विधि में जल का उपयोग अल्पव्ययी तरीके से होता है जिससे सतह वाष्पन एवं भूमि रिसाव से जल की हानि कम से कम होती है। सिंचाई की यह विधि शुष्क  एवं अर्ध-शुष्क  क्षेत्रों के लिए अत्यन्त ही उपयुक्त होती है जहाँ इसका उपयोग फल बगीचों की सिंचाई हेतु किया जाता है। टपक सिंचाई ने लवणीय भूमि पर फल बगीचों को सफलतापूर्वक उगाने को संभव कर दिखाया है। इस सिंचाई विधि में उर्वरकों को घोल के रूप में भी प्रदान किया जाता है। टपक सिंचाई उन क्षेत्रों के लिए अत्यन्त ही उपयुक्त है जहाँ जल की कमी होती है, खेती की जमीन असमतल होती है और सिंचाई प्रक्रिया खर्चीली होती है। टपक सिंचाई से क्या लाभ होते हें  पारम्परिक सिंचाई की तुलना में टपक सिंचाई के अनेकों लाभ हैं जो निम्नलिखित हैं: टपक सिंचाई में जल उपयोग दक्षता 95 प्रतिशत तक होती है जबकि पारम्प...

जानें किस महीने में कौन सी सब्जी लगाने से होता है अधिक फायदा

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जनवरी राजमा, शिमला मिर्च, मूली, पालक, बैंगन, चप्‍पन कद्दू फरवरी राजमा, शिमला मिर्च, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, फूलगोभी, बैंगन, भिण्‍डी, अरबी, एस्‍पेरेगस, ग्‍वार मार्च ग्‍वार, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, खरबूजा, तरबूज, पालक, भिण्‍डी, अरबी अप्रैल चौलाई, मूली मई फूलगोभी, बैंगन, प्‍याज, मूली, मिर्च जून फूलगोभी, खीरा-ककड़ी, लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, बीन, भिण्‍डी, टमाटर, प्‍याज, चौलाई, शरीफा जुलाई खीरा-ककड़ी-लोबिया, करेला, लौकी, तुरई, पेठा, भिण्‍डी, टमाटर, चौलाई, मूली अगस्‍त गाजर, शलगम, फूलगोभी, बीन, टमाटर, काली सरसों के बीज, पालक, धनिया, ब्रसल्‍स स्‍प्राउट, चौलाई सितम्‍बर गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, सलाद, ब्रोकोली अक्‍तूबर गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्‍ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, राजमा, मटर, ब्रोकोली, सलाद, बैंगन, हरी प्‍याज, ब्रसल्‍स स्‍प्राउट, लहसुन नवम्‍बर ...

जीएम फसलों से उपजे सवाल, जानें क्या है जीएम तकनीक, इसके लाभ एवं हानि

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संयुक्त राष्ट्र और कुछ भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों के सम्मिलित प्रयासों से जीनांतरित (जेनेटिकल मॉडीफाइड: जीएम) बैंगन के विकास में सफलता प्राप्त कर ली गई है । हालांकि पर्यावरण सुरक्षा नियमों के तहत भारत सरकार द्वारा कानूनी तौर पर स्थापित की गयी आनुवंशिक इंजीनियरी अनुमति समिति (जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी-जीईएसी) की मंजूरी के बाद ही जी. एम. फसलों को उगाने की मंजूरी मिल सकती है । उसके बाद ही बीजों को खेतों में बोने के लिए निजी बीज कंपनियों द्वारा किसानों को वितरित किया जाएगा । इससे पहले भी हमारे देश में जीएम सरसों को उगाने की कवायद चल रही थी, लेकिन जीएम विरोधियों के कारण इस पर रोक लगा देनी पड़ी थी । बीटी कपास को लेकर भी शुरू-शुरू में बड़ा विवाद उठा था । लेकिन 26 मार्च, 2002 को जीईएसी ने बीटी कपास की भारत में व्यावसायिक खेती को मंजूरी दे दी । लेकिन उस समय केवल छह राज्यों, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु को ही बीटी कपास के मैक 12, मैक 162 तथा मैक 184 नामक तीन संकर किस्में उगाने की मंजूरी मिली थी । ऐसा लगता है कि भूख के खिलाफ इंसान की जो जंग...

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