संयुक्त राष्ट्र और कुछ भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों के सम्मिलित प्रयासों से जीनांतरित (जेनेटिकल मॉडीफाइड: जीएम) बैंगन के विकास में सफलता प्राप्त कर ली गई है ।
हालांकि पर्यावरण सुरक्षा नियमों के तहत भारत सरकार द्वारा कानूनी तौर पर स्थापित की गयी आनुवंशिक इंजीनियरी अनुमति समिति (जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी-जीईएसी) की मंजूरी के बाद ही जी. एम. फसलों को उगाने की मंजूरी मिल सकती है । उसके बाद ही बीजों को खेतों में बोने के लिए निजी बीज कंपनियों द्वारा किसानों को वितरित किया जाएगा ।
इससे पहले भी हमारे देश में जीएम सरसों को उगाने की कवायद चल रही थी, लेकिन जीएम विरोधियों के कारण इस पर रोक लगा देनी पड़ी थी । बीटी कपास को लेकर भी शुरू-शुरू में बड़ा विवाद उठा था । लेकिन 26 मार्च, 2002 को जीईएसी ने बीटी कपास की भारत में व्यावसायिक खेती को मंजूरी दे दी । लेकिन उस समय केवल छह राज्यों, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु को ही बीटी कपास के मैक 12, मैक 162 तथा मैक 184 नामक तीन संकर किस्में उगाने की मंजूरी मिली थी ।
ऐसा लगता है कि भूख के खिलाफ इंसान की जो जंग है उसमें जैव प्रौद्योगिकी की अहम भूमिका हो सकती है । फसलों के बंपर उत्पादन से लेकर उनकी गुणवत्ता सुधारने, उन्हें कीट प्रतिरोधी बनाने और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उग सकने की क्षमता पैदा करने में जी. एम. तकनीक लाभदायक साबित हो सकती है ।
विज्ञान की भाषा में कहें तो यह तकनीकी फसलों के आनुवांशिक फेरबदल यानी जेनेटिक मॉडीफिकेशन को संभव बनाती है । जंगली फसलों फल-फूलों को सामान्य और उपयोगी प्रजातियों में बदलने में भी यह तकनीक सहायक है ।
फसलों के आनुवांशिक सुधार को भी यह तकनीक संभव बनाती है । आनुवांशिक फेरबदल से किसी एक फसल के दूसरी फसलों से पूर्णतया भिन्न बनाने तथा उसमें कीटों के हमले के विरूद्ध विशेष प्रभाव उत्पन्न करना ही संभव हो पाया है । केवल इतना ही नहीं बल्कि जीएम फसलों को मानव शरीर और जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य तथा पर्यावरण और जैव विविधता पर पड़ने वाले उनके संभावित असर को लेकर ही मुख्य रूप से आशंकाओं का बाजार गरम है ।
चिंता जताई जा रही है कि कहीं जीएम खाद्य मानव और जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य पर विषाक्त (टॉक्सीसिटी) तथा एलर्जीजन्य प्रतिक्रिया तो नहीं उत्पन्न करेंगे । जीएम खाद्य में मौजूद डीएनए मानव शरीर में मौजूद डीएनए से छेड़छाड़ कर जीन परिवर्तन द्वारा कोई समस्या तो नहीं खड़ी कर देंगे ।
पर्यावरणविद जीएम फसलों में छिपी अज्ञात आशंकाओं को लेकर अत्यधिक चिंतित हैं । उनकी धारणा है कि ये फसलें हालांकि परंपरागत फसलों की तरह ही लगती हैं, लेकिन भविष्य में पर्यावरण और जैव विविधता को यह किस तरह से हानि पहुंचाएंगी, यह कहना कठिन है ।
जी. एम. फसलों से जीन पड़ोसी फसलों में स्थानांतरित होकर कहीं जीन प्रदूषण का रूप तो नहीं ले लेंगे, इस बारे में भी पर्यावरणविदों ने अपनी चिंता जताई हैं । जी. एम. फसलों में कीट नियंत्रण के लिए जो जैविक विष डाला जाता है, कीटों में उसके विरूद्ध प्रतिरोधकता विकसित होने की संभावना को लेकर भी चिंता है, क्योंकि विष के विरूद्ध प्रतिरोधकता उत्पन्न करने का कीटों का पुराना इतिहास रहा है । यदि ऐसा हुआ तो उच्च प्रतिरोधकता क्षमता वाले कीटों के विकसित हो जाने से कृषि व्यवस्था अत्यंत शोचनीय हो जायेगी ।
लेकिन जी.एम. फसलों के बारे में जो आशंकाएं जताई गयी हैं वह अभी वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं हुई है । मानव स्वास्थ्य पर इनके असर को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो अध्ययन हुए हैं, उनमें से अधिकांश का निष्कर्ष यही है कि मनुष्य की सेहत पर जी.एम. फसलों का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता । पर्यावरण और जैव-विविधता पर जी.एम. फसलों के पड़ने वाले असर को लेकर भी अभी तक कोई विशेष निष्कर्ष नहीं निकल पाया है ।
लेकिन चूहे पर हुए कुछ शोधों से प्रतिकूल परिणाम जरूर सामने आये हैं । बहुराष्ट्रीय बीज कंपनी मोसेंटो द्वारा जर्मनी में जी.एम. फसलों के बारे में कराए गये शोध की रिपोर्ट मई 2005 में लीक हो गयी । इससे काफी बवाल मचा था ।
बाद में 2005 में इसका दायरा बढ़ाकर तीन राज्यों हरियाणा, पंजाब तथा राजस्थान को भी इसमें शामिल किया गया था तथा बीटी कपास की बीस संकर किस्मों को उगाने की स्वीकृति दी गयी । आजकल बीटी कपास की बीज संकर किस्मों को व्यावसायिक तौर पर भारत में उगाने की स्वीकृति जीईएसी द्वारा मिली हुई है ।
पौधों में कीटों व रोग प्रकोपों के नियंत्रण में प्रयुक्त होने वाले कीटनाशकों और खरपतवारनाशियों के दुष्प्रभावों को देखते हुए ही जैव प्रौद्योगिकीविदों ने आनुवांशिक इंजीनियरी (जेनेटिक इंजीनियरिंग) की तकनीकों का सहारा लेकर पराजीनी यानी ट्रांसजेनिक फसलों को उगाने की दिशा में पहल की ।
पौधे में पराए जीन, पराजीनी फसलों को उगाने में उन्हें कामयाबी मिली ये पराजीनी या जीनांतरित (जेनेटिकली मॉडीफाइड) फसलें बहुगुणी साबित हुई हैं । ये जीएम फसलें रोग और कीट प्रतिरोधी तो होती ही हैं, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उग सकने की क्षमता रखती है । साथ ही, अधिक उपज देने में भी यह सक्षम होती हैं
शोध में चूहों पर किये गये प्रयोग में पाया गया कि जीन संवर्धित मक्का की एक किस्म एमओएन 863 को खाने से चूहों में अनेक विकृतियां आ गयीं । पाया गया कि इस जी.एम. मक्का को खाने वाले चूहों के गुर्दो, जिगर और रक्त संरचना में बदलाव आ गये जबकि सामान्य मक्का खाने वाले चूहों में कोई प्रतिकूल असर नहीं दिखाई दिया।
जी.एम. किस्म का मक्का हो, सरसों हो, आलू हो या फिर बैंगन, जिसकी हमारे देश में लाए जाने की सरगर्मी जोरों पर है । बहरहाल ये सभी खाद्य पदार्थ के साथ अनुभव कैसे रहे, अब इसी का थोड़ा लेखा-जोखा लिया जाये ।
कपास में बेसिल धुरिजिएसि (बीटी) नामक मिट्टी में पाये जाने वाले जीवाणु को प्रविष्ट कराकर ही बीटी कपास तैयार की गयी । पहले पहल अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया में ही 1996 में बीटी कपास उगाई गयी । देखादेखी अन्य देशों में भी बीटी कपास की खेती शुरू की गयी ।
बीटी इन मामलों में महत्त्वपूर्ण कही जा सकती है कि इस पर बालवर्म (हेलिकावर्पा) जिसे भारत में डेंडू छेदक झल्ली भी कहा जाता है, का कोई असर नहीं होता है । ये कीट कपास की सामान्य फसल पर कहर बरपा कर उसे बर्बाद कर देते हैं ।
इस तरह बीटी कपास उगाने से रासायनिक कीटनाशकों का कम इस्तेमाल करना पड़ता है उदाहरण के तौर पर, जहां साधारण कपास उगाने में कीटनाशकों के आठ छिड़कावों की जरूरत पडती है । वहां अब केवल दो छिड़काव से ही काम चल जाता है ।
कीटनाशकों का कम इस्तेमाल न केवल किसानों का स्वास्थ्य बेहतर बनाता है, बल्कि भू-जल तथा नदियों तक पहुंचने वाले इनके हानिकारक अवशेषों में भी कमी लाता है । बीटी कपास के बीज सामान्य कपास के बीजों की तुलना में कुछ महंगे जरूर पड़ते हैं । पर कीटनाशकों पर होने वाले खर्चे में कटौती के साथ-साथ बीटी कपास की फसल का उत्पादन भी अधिक होता है ।
लेकिन जहां बीटी कपास की खेती के इतने फायदे हैं, वहीं इसको लेकर कुछ आशंकाएं भी है तथा कुछ विवाद भी खड़े हुए हैं । ये आशंकाएं और विवाद विशेष रूप से 1999 के दौरान चर्चा में आये जब कार्नेल विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट में यह कहा गया कि बीटी कपास के विषाक्त पराग को खाने से मानार्क तिलियों की मृत्यु हुई ।
जीएम फसलों से जुड़ी बहस को इस रिपोर्ट ने नये सिरे से हवा दी । वैज्ञानिकों एवं पर्यावरणविदों ने अपनी आशंकाएं यह कहकर व्यक्त की कि पराजीनी फसलें भविष्य में पर्यावरण और जैव विविधता को प्रभावित कर सकती है ।
कीटों में बीटी जैविक विष के विरूद्ध प्रतिरोधकता भी विकसित होने की संभावनाएं वैज्ञानिकों द्वारा व्यक्त की गयी । आशंका जताई गयी कि अगर उच्च प्रतिरोधकता क्षमता वाले कीटों के प्रकार विकसित हो गये तो कृषि व्यवस्था के डाँवाडोल होने के आसार भी प्रकट हो सकते है ।
मालिकों से जुड़े प्रवक्ताओं तथा वैज्ञानिकों का कहना है कि बीटी कपास को उगाने से अनेक राज्यों के जितने क्षेत्रफल में साधारण कपास उगाई जा रही थी उससे कहीं अधिक क्षेत्रफल में आज वहाँ बीटी कपास उगाई जा रही है । इससे किसानों में जोश है तथा वे कंपनी से बीजों के खरीदने के लिए खुशी-खुशी आ रहे हैं । मालिकों का दावा है कि पारंपरिक रूप से उगाई गयी कपास की फसल से तीस प्रतिशत अधिक उत्पादन लेना संभव हो पाया है ।
लेकिन पर्यावरणविद् इन दावों को खारिज करते हुए कहते हैं कि ये सब खोखले दावे हैं । उनका कहना है कि आंध्र प्रदेश में वारंगल जिले में बीटी कपास उगाने वाले किसानों की बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं तथा हजारों की संख्या में भेड़ों की मौत कुछ और ही कहानी कहती हैं । विदर्भ के किसान भी विदर्भी जन आंदोलन छेड़कर बीटी कपास के खिलाफ उठ खड़े हुए । वहां से भी किसानों द्वारा आत्महत्या करने की कुछ खबरें मिली हैं ।
बीटी कपास के खेतों में काम करने वाले कुछ किसान में एलर्जीजन्य प्रतिक्रिया भी पैदा होने के मामले सामने आये है । छोटे और मझोले किसानों के लिए समस्या और गंभीर है । साधारण कपास की तुलना में बीटी कपास को उगाने में तीन गुना अधिक पानी की जरूरत होती है ।
उपर से बीटी कपास के बीजों की कीमत साधारण कपास के बीजों की तुलना में चार गुना तक अधिक होती है । यही कारण है कि पंजाब में बीटी कपास के अधिकांश बीज गुजरात से अनधिकृत रूप से खरीदे गये । ऐसे बीजों की कीमत अधिकृत बीजों की कीमत से बहुत कम होती है ।
जब इतने विवाद हैं और इतने अंतर्विरोधी दावे हैं तो ऐसे में क्या किया जाये? क्या केवल भावी आशंकाओं को देखते हुए कृषि के क्षेत्र में जैव-प्रौद्योगिकी और आनुवांशिक इंजीनियरी जैसी आधुनिक तकनीकों से मुंह मोड़ लें जबकि दूसरे देश इन तकनीकों को न केवल अपना रहे हैं बल्कि उनसे फायदे भी ले रहे हैं? इस बाबत चीन का उल्लेख किया जा सकता है जहां 1997 से बीटी कपास उगाई जा रही है और किसान कपास की उत्पादन लागत को 28 प्रतिशत कम कर चुके हैं ।
न केवल इतना बल्कि जी.एम. फसलों पर छिड़े विवाद को अनसुना करते हुए चीन ने जी.एम. सोयाबीन, जी. एम. धान, जी.एम. टमाटर, जी. एम. कपास सहित लगभग 100 जी.एम. फसलों को उगाने के परीक्षण चला रखे है ।
वैज्ञानिक शोध पर आधारित वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि विकासशील देशों में जीएम तकनीक से अमूमन सभी फसलों का उत्पादन 25 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता हैं । पर्यावरणविदों और पर्यावरण बचाओ आंदोलन से जुड़े लोगों का सम्मान करते हुए इस बात को रेखांकित किया जाना जरूरी है कि विरोध केवल विरोध के लिए ही नहीं होना चाहिए । सभी पहलुओं पर अच्छी तरह से विचार-विमर्श करने तथा वैज्ञानिक परीक्षणों के नतीजे आने के बाद ही जी.एम. फसलों के पक्ष या विपक्ष में कोई अंतिम राय कायम करनी चाहिए ।
जी.एम. फसलों पर उठे विवादों के मद्देनजर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कृषि और खाद्य संगठन की मदद से स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर इन फसलों के पड़ने वाले प्रभावों की संपूर्ण जाच एवं मूल्यांकन करवाए जाने का बीड़ा उठाया जाना स्वागत योग्य है, क्योंकि इससे बाजार तक आने से जी.एम. फसलों की प्रमाणिकता एवं सुरक्षा का निर्धारण हो जायेगा ।
वैसे देखा जाये तो किसानों में भी जी.एम. फसलों को लेकर दो ध्रुव बन गये हैं । बीटी बीजों का बहिष्कार करने वाले किसानों के एक वर्ग का कहना है कि ये स्वदेशी कंपनियां विश्व बाजार संगठन की व्यूह रचना के तहत भारतीय किसानों पर विदेशी बीज लाद कर उन्हें इन बीजों पर निर्भर बनाना चाहती हैं । एक अन्य कृषक वर्ग भी है जो जी.एम. फसलों के लाभों से परिचित हैं । बीटी बीजों का स्वागत करने के साथ-साथ यह कृषक वर्ग बीजों के चयन में किसानों की स्वतंत्रता की दलील भी देते हैं ।
जी. एम. फसलों को उगाने में स्वतंत्रता की बात उठाने में कुछ तो दम है लेकिन जैव निरापदता (बायो सेफ्टी) की भी अनदेखी नहीं की जा सकती हैं । अत: जीएम उत्पादों या खाद्य पदार्थो पर लेबल जरूर लगाए जाने चाहिए ताकि उपभोक्ता को उन्हें अपनाने या खारिज करने की स्वतत्रता हो । अब भी बाजार में आर्गेनिक या कार्बनिक खाद्य पदार्थ परंपरागत खाद्य पदार्थों के साथ देखने को मिलते हैं । यह उपभोक्ता पर छोड देना चाहिए कि वह उन्हें खरीदे या नहीं ।
जीएम फसलें क्या हैं ?
जैनेटिक इंजीनियरिंग यानी जीनियागरी के द्वारा किसी भी जीव या पौधों के जीन को दूसरे पौधों में डाल कर एक नई फसल प्रजाति विकसित कर सकते हैं। मतलब यह कि अब दो अलग-अलग प्रजातियों में भी संकरण किया जा रहा है। वैसे प्रकृति में जीनों का जोड़-तोड़ चलता रहता है। इधर के जीन उधर और उधर के इधर। पर प्रकृति में यह बड़ी धीमी प्रक्रिया है, कई हजारों लाखों वर्षों में
ये बदलाव आते हैं। क्योंकि प्रकृति पूरी तरह तसल्ली करके ही किसी पौधे या जानवर या सूक्ष्मजीव को पनपने देती है, वरना उसे खत्म कर देती है। लेकिन आज जैनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से जीनों को एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में डाला जा रहा है। इस प्रकार प्राप्त फसलों को पारजीनी फसलें यानी जैनेटिकली मोडिफाइड क्रॉप (Genetically modified crops) कहा जाता है।
हालांकि इन फसलों का विचार नया लगता है लेकिन इनके संबंध में मानव समाज में सदियों से विचार पनपते रहे हैं। मानव अपने जीवन को सुविधाजनक करने के लिए समय-समय पर अनेक वस्तुओं का विकास करता रहता है। इसी प्रकार फसलों को उगाने के दौरान फसलों को अनेक बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी बनाने या उनमें कम पानी में विकास करने की क्षमता को विकास करने के लिए प्रयास किए जाते रहे हैं । साथ ही फसलों से अधिक उत्पादन के लिए भी अनेक प्रयास किए गए हैं। जीनांतरित फसलें इसी दिशा में एक और कदम हैं।
जीनांतरण के लाभ
कल्पना करें कि यदि ऐसा ऐसा पौधा हो, जिसे रोजाना पानी देने के बजाय सिर्फ महीने में एक बार पानी देने से वह बढ़ता रहे या फिर ऐसा टमाटर का पौधा हो, जिससे उपजे टमाटर बिना सड़े लंबे समय तक ताजा रहें या आलू का ऐसा पौधा हो, जिसमें कीट न लगें और जिससे अधिक मात्रा में आलू मिले या फिर चावल का ऐसा पौधा हो, जिसमें कुछ औषधीय गुण भी हों। …तो ऐसा सिर्फ उन पौधों में हो सकता है जो जीनांतरित हों।
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है जीनांतरित फसलें ऐसी फसलें हैं जिनको जैवप्रौद्योगिकी और जैव अभियांत्रिकी गतिविधियों के द्वारा जीन स्तर तक परिवर्तित किया गया है। इस प्रक्रिया में पौधे में नए जीन यानी डीएनए को डालकर उसमें ऐसे मनचाहे गुणों का समावेश किया जाता है जोकि प्राकृतिक रूप से उस पौधे में नहीं होते हैं। इस तरह से ऐसा पौधे जो कीटों के प्रति, सूखे जैसी पर्यावरण परिस्थिति और बीमारियों के प्रति कम प्रतिरोधी हों उसे प्रतिरोधी बनाया जा सकता है। या फिर हम जीनांतरित फसलों से उत्पादन क्षमता और पोषक क्षमता को बढ़ा सकते हैं।
जीनांतरण की प्रक्रिया
इसके लिए शोधकर्ता टिश्यू कल्चर, उत्परिवर्तन द्वारा और नए सूक्ष्मजीवों की मदद से पौधों में नए जीनों का प्रवेश कराते हैं। इस तरह की एक बहुत ही समान्य प्रक्रिया में पौधे को एगारेबेटेरियम टुमुफेसियन् () नामक सूक्ष्मजीव से सक्रंमित कराया जाता है। यह सूक्ष्मजीव एक विशिष्ट जीन जिसे टी-डीएनए () कहा जाता है, से पौधे को सक्रंमित करके पौधे में डीएनए का प्रवेश कराकर एक गठान बनाता है। शोधकर्ता इस एगा्रेबेटेरियम के टी-डीएनए को वांछित जीन जो बीमारी या कीट प्रतिरोधक होता है उससे सवाधानी से प्रतिस्थापित कर देते हैं जिससे वह कीट फसल को प्रभावित न कर सके और फसल उत्पादन में वृद्धि हो सके।
बैक्टीरिया से संक्रतिम वांछिन जीन को टी-डीएनए के स्थान पर प्रतिस्थापित करके पौधे के जीनोम में बदलाव लाकर मनचाहे गुणों की जीनांतरिक फसल प्राप्त की जाती है। वैज्ञानिक डीएनए बंध के लिए बहुत ही सूक्ष्म सोने और टंगस्टन के कणों का उपयोग करते हैं जिनको उच्च दाब पर पौधे के जीनोम में कोशिका नाभिक में छोड़ा जाता है।
हमने अक्सर बीटी कॉटन, बीटी बैंगन और बीटी आलू नाम सुना होगा। इसमें आगे वाला शब्द बीटी को एग्रोबेक्टेरियम () के संक्षिप्त नाम के रूप में उपयोग किया जाता है। इसका दूसरा बैक्टीरिया बेसिलस थुरेंजिनेसिस है ()। इस बेक्टीरिया में उपस्थित विशेष जीन जिसे सीआरवायी () जीन कहते हैं की मदद से यह एक प्राकृतिक कीटनाशक जिसे सीआरवाय टॉक्सिन () कहते हैं बनाया जाता है। जब इस जीन को पौधे में डाला जाता है तो पौधा कीटनाशक उत्पन्न करता है जिससे वह कीटों के प्रति प्रतिरोधक हो जाता है।
जीनांतरण का इतिहास
पहला जीनांतरित पौधा सन् 1982 में उत्पन्न किया गया था। यह पौधा एक प्रतिजैविक प्रतिरोधक तम्बाकू पौधा था। इसके बाद तो अनेक प्रकार के ऐसे जीनांतरिक पौधों का विकास हुआ जो कीटनाशक और पीड़कनाशक होने के साथ ही पोषक तत्वों की अधिक मात्रा रखने के साथ ही अधिक उपज भी देते हैं। सन् 1994 में अमेरिका में ऐसा जीनांतरिक टमाटर बाजार में आया जो काफी समय तक खराब नहीं होता था। सन 2000 में वैज्ञानिकों ने अधिक पोषक तत्वों को रखने वाले जीनांतरिक ‘सुनहरे चावलों’ का विकास किया।
बीटी कॉटन को सन 2002 में कानूनी रूप से मान्यता मिली। भारत में यह पहली जीनांतरित व्यवसायिक फसल थी। उस समय माना गया था कि कपास की इस नयी किस्म से कपास का उत्पादन बढ़ेगा। आज भारत विश्व में कपास उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। भारत में बीटी बैंगन, बीटी चावल, बीटी भिंडी, जीनांतरिक टमाटरों को कानूनी मान्यता देने के तहत उनका परिक्षण चल रहा है।
जैनेटिक इंजीनियरिंग के कई फायदे भी हैं। जैसे कुछ सालों पहले पूसा के वैज्ञानिकों ने रामदाने का जीन निकालकर आलू में डाल दिया, जिससे आलू में प्रोटीन की मात्रा बढ़ गई। अब ऐसे अनुसंधान से विकासशील या गरीब देशों में होने वाली कुपोषण की समस्या से छुटकारा मिल सकता है। इसी तरह सोयाबीन की ऐसी किस्म तैयार की गई है, जो खरपतवार नाशकों को सहन कर लेती है। ऐसे ही मक्का में भी ऐसी किस्म तैयार की गई है, जिसमें कीड़ा नहीं लगता। इसी प्रकार अब अगर हम धान की ऐसी किस्म विकसित कर लें जो गेहूं जितना पानी ही उपयोग करे, तो पानी की कितनी बचत हो।
जीनांतरिक फसलें और सावधानी
एक ओर जहां अनेक अध्ययनों से पता चलता है कि विश्व स्तर पर जीनांतरिक फसलों की स्वीकार्यता बढ़ी है वहीं ऐसी फसलों को भोजन के रूप में उपयोग करने संबंधी विवाद भी बढ़ रहे हैं। जहां एक ओर जीनांतरिक फसलों की मदद से खाद्यात्रों के भंडारण से निपटने के साथ ही कुपोषण की समस्या को हल करने का दावा किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर अप्राकृतिक परिवर्तित फसलों के बढ़ते उपयोग को लेकर सुरक्षा के प्रति चिंता भी जाहिर की जा रही है।
वैसे इंजीनियरिंग की तकनीक में कोई खराबी नहीं है, या कहें कि इस सोच में कोई कमी नहीं है। बस इसके पर्यावरण पर पड़ने वाले खतरों की ठीक से जांच की जाने की जरूरत है। हां, और इसके लिए किसी भी बीज को बाजार में बेचने से पहले, उसकी सही जांच और कई वर्षों तक उसका खेत में परीक्षण किया जाना जरूरी है।
नई-नई तरक्की, शोध, तकनीकों के साथ, नई-नई जिम्मेदारियां भी आती हैं, जिनका सही पालन करना जरूरी है। हम अगर मानक सभ्यता और मानव समाज के कल्याण को ध्यान में रखकर शोध करेंगे तो नतीजे अच्छे ही निकलेंगे।
जीएम सरसों की व्यावसायिक खेती को मंजूरी के लिए जेनेटिक इंजीनियरिग अप्रेजल कमेटी के पास पहुंची दरखास्त के खिलाफ देशभर की 400 संस्थाएं एकजुट हो गई हैं। इन संस्थाओं ने जीएम सरसों के खिलाफ सत्याग्रह मोर्चा खोल दिया है।
सरसों का तेल भोजन में प्रयोग किया जाता है। पंजाब में सरसों का साग खाने का प्रचलन है, सरसों की खल को दुधारू पशुओं को खिलाया जाता है। अगर इसे मंजूरी मिल जाती है तो यह सरसों सीधा हमारी खुराक का हिस्सा बन जाएगी। पूरी दुनिया में इस बात को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि जीएम फसल खाने के लिए सुरक्षित है या नहीं। ऐसे में केंद्र व प्रदेश सरकार इन सभी खतरों पर आंखें मूंदते हुए इसे मंजूरी देने पर तुली हैं।
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